गीता अध्याय 18 श्लोक 66: सब छोड़कर मेरी शरण में आ, शोक मत कर (सरल अर्थ)
गीता अध्याय 18 श्लोक 66 "सर्वधर्मान्परित्यज्य" का शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ और मतलब। जानिए शरणागति का सही अर्थ, आम गलतफहमियाँ और डर व चिंता छोड़कर जीने में इसका उपयोग।
कभी-कभी हम बहुत बोझ उठा लेते हैं। बहुत सी ज़िम्मेदारियाँ, बहुत सी चिंताएँ, बहुत से "अगर ऐसा हो गया तो"। गीता का अंतिम अध्याय एक ऐसे श्लोक पर आकर अपना उपदेश समेटता है जिसे बहुत से पाठक पूरी गीता का सबसे सांत्वना देने वाला श्लोक मानते हैं: अध्याय 18, श्लोक 66।
नीचे श्लोक, सरल अर्थ और उसे सावधानी से समझने की बात दी गई है।
श्लोक (गीता 18.66)
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ १८.६६ ॥
सब धर्मों को छोड़कर तू केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।
शब्दार्थ
- सर्वधर्मान्: सभी धर्मों (कर्तव्यों, मार्गों, आश्रयों) को
- परित्यज्य: छोड़कर
- माम् एकम्: केवल मुझे
- शरणम्: आश्रय
- व्रज: जा, ले
- अहम्: मैं
- त्वाम्: तुझे
- सर्वपापेभ्यः: सब पापों और बोझों से
- मोक्षयिष्यामि: मुक्त कर दूँगा
- मा शुचः: शोक मत कर, चिंता मत कर
यह श्लोक कहाँ से आता है?
यह श्लोक गीता के अंत के पास है। सत्रह अध्यायों में कृष्ण कर्म, ज्ञान, भक्ति और संयम समझा चुके हैं। अध्याय 18 में वे सार रखते हुए कहते हैं कि मैंने तुझे अत्यंत गोपनीय ज्ञान बता दिया, इस पर पूरी तरह विचार कर, फिर जैसा चाहे वैसा कर। उसके बाद वे इस श्लोक में अपनी सबसे आत्मीय सलाह देते हैं। जो अर्जुन शोक में डूबकर बातचीत शुरू करता है, उसे अब कहा जा रहा है: शोक मत कर।
श्लोक का असली संदेश
- "सब मुझे ही करना है" का बोझ छोड़िए। कई टीकाकार "सब धर्मों को छोड़ना" का अर्थ हर कर्तव्य और उसके फल से चिंतित होकर चिपके रहने को छोड़ना मानते हैं, और ईश्वर पर भरोसा रखना।
- एक ही आश्रय। सौ जगह सुरक्षा ढूँढने के बजाय एक भरोसे में टिकिए।
- वादा सांत्वना का है। "शोक मत कर" इसका हृदय है। कृष्ण अपना उपदेश भय के आदेश से नहीं, आश्वासन से समाप्त करते हैं।
अलग-अलग परंपराएँ इस श्लोक की व्याख्या थोड़ी अलग करती हैं। भक्ति परंपराएँ कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण पर ज़ोर देती हैं। कुछ अन्य कर्ता-भाव छोड़ने पर ज़ोर देती हैं। हर व्याख्या में स्वर भरोसे और भय से मुक्ति का है।
तीन आम गलतफहमियाँ
- "सब धर्म छोड़ने का मतलब कर्तव्य छोड़ देना।" यह अर्थ नहीं हो सकता, क्योंकि पूरी गीता अर्जुन को कर्म करने को कहती है। कृष्ण सत्रह अध्याय कर्तव्य सिखा चुके हैं। श्लोक इस बारे में है कि हम किस भाव से कर्म करें, चिंता में चिपके बिना।
- "शरणागति का मतलब हाथ पर हाथ रखकर बैठना।" इस उपदेश के बाद अर्जुन उठकर युद्ध करता है। समर्पण और प्रयास साथ चलते हैं।
- "अब मैं अपने कर्मों के परिणाम की चिंता न करूँ।" श्लोक आशा और मुक्ति देता है, पर यह नहीं कहता कि ज़िम्मेदारी समाप्त हो जाती है। वह भरोसे के साथ ईमानदार जीवन माँगता है।
रोज़ की ज़िंदगी में कैसे अपनाएँ
- जब सब भारी लगे: जो कर सकते हैं वह कीजिए, फिर मन में कहिए, "मैंने अपना हिस्सा कर दिया।" बाकी अपनी आस्था को सौंप दीजिए।
- भविष्य का डर हो: याद कीजिए कि चिंता से कल कभी साफ़ नहीं हुआ। आज के काम पर लौटिए।
- अपराध-बोध हो: उसे सीखने और फिर से शुरू करने का बुलावा मानिए, खुद को बार-बार सज़ा देने का नहीं।
- अकेलापन लगे: इस श्लोक का अंतिम शब्द याद कीजिए, "मा शुचः", यानी शोक मत कर।
एक छोटा अभ्यास: रात को अपनी तीन सबसे बड़ी चिंताएँ लिखिए। हर एक के आगे कल के लिए एक छोटा कदम लिखिए। जो बचे, उसे प्रार्थना या आस्था को सौंपकर सो जाइए।
पूरी गीता सरल हिंदी में पढ़ें
यह श्लोक गीता का शिखर है, पर इसे पहले के अध्यायों के साथ पढ़कर ही सबसे अच्छी तरह समझा जाता है। पूरी भगवद्गीता को हर संस्कृत श्लोक और सरल हिंदी अर्थ के साथ पढ़ने के लिए सात्विक सेतु हिंदी बंडल देखिए: 14 ग्रंथ और 2 बोनस, सरल हिंदी में, जिसमें गीता के सभी 700 श्लोक हैं। पहले मुफ़्त सैंपल पढ़ सकते हैं: गीता अध्याय 12 मुफ़्त सैंपल (PDF)।
संक्षेप में
गीता 18.66 में कृष्ण अर्जुन से चिंता में चिपकना छोड़कर केवल उनकी शरण लेने को कहते हैं और वचन देते हैं कि "शोक मत कर"। यह भरोसे का श्लोक है: सच्चाई से कर्म कीजिए, फिर डर को छोड़ दीजिए।