गीता अध्याय 5 श्लोक 18: सबको समान आदर से देखना (सरल अर्थ)
गीता अध्याय 5 श्लोक 18 "विद्याविनयसम्पन्ने" का शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ, मतलब और जीवन में उपयोग। जानिए समदर्शी होने का क्या अर्थ है और सबके साथ सम्मान से कैसे पेश आएँ।
हम अक्सर बिना सोचे लोगों के साथ अलग-अलग व्यवहार करते हैं। बड़े अफसर से नरमी से बात करते हैं और सब्ज़ी वाले से रूखेपन से। मेहमान के सामने धैर्य रखते हैं और सफ़ाई करने वाले पर झुँझला जाते हैं। भगवद्गीता अध्याय 5 के श्लोक 18 में देखने का एक बिल्कुल अलग तरीका बताती है।
नीचे श्लोक, उसका सरल हिंदी अर्थ और रोज़ की ज़िंदगी में इसका उपयोग दिया है।
श्लोक (गीता 5.18)
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ ५.१८ ॥
ज्ञानी लोग विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और चांडाल में भी समान दृष्टि रखते हैं।
शब्दार्थ
- विद्या-विनय-सम्पन्ने: जो ज्ञान और विनम्रता से युक्त है
- ब्राह्मणे: ब्राह्मण में (विद्वान व्यक्ति में)
- गवि: गाय में
- हस्तिनि: हाथी में
- शुनि: कुत्ते में
- च एव: और भी
- श्वपाके: चांडाल में, समाज के सबसे निचले माने गए व्यक्ति में
- पण्डिताः: ज्ञानी लोग
- समदर्शिनः: समान दृष्टि से देखने वाले
यह श्लोक कहाँ से आता है?
अध्याय 5 की शुरुआत अर्जुन के प्रश्न से होती है। कृष्ण ने कर्मों के त्याग की भी प्रशंसा की है और निष्काम कर्म की भी, इसलिए अर्जुन पूछता है कि दोनों में कौन-सा श्रेष्ठ है। कृष्ण समझाते हैं कि दोनों एक ही लक्ष्य तक ले जाते हैं, पर निष्काम कर्म से शुरुआत करना सरल है। आगे के श्लोकों में वे उस व्यक्ति का वर्णन करते हैं जो स्थिर और ज्ञानी हो चुका है। श्लोक 18 इसी वर्णन का भाग है कि ऐसा व्यक्ति दुनिया को कैसे देखता है।
श्लोक का असली संदेश
- समान का अर्थ एक जैसा व्यवहार नहीं है। श्लोक में विद्वान, गाय, हाथी, कुत्ता और उस समय के समाज का सबसे निचला माना गया व्यक्ति, सब अलग-अलग गिनाए गए हैं। कृष्ण यह नहीं कहते कि सबकी भूमिका या स्वभाव एक है। वे कहते हैं कि ज्ञानी सबको एक जैसे भीतरी आदर से देखता है।
- ज्ञानी की दृष्टि बाहरी पहचान से गहरी होती है। जन्म, पढ़ाई, ताकत और पद बाहर की बातें हैं। गीता सिखाती है कि हर प्राणी में वही परमात्म-तत्व है, और ज्ञानी उसी को देखता है।
- आदर कोई इनाम नहीं है। हम अक्सर सिर्फ़ उन्हीं को आदर देते हैं जो हमारे काम आते हैं या प्रभावशाली हैं। यह श्लोक याद दिलाता है कि बुनियादी सम्मान हर किसी का हक़ है।
तीन आम गलतफहमियाँ
- "मुझे हर स्थिति में सबके साथ बिल्कुल एक जैसा व्यवहार करना चाहिए।" नहीं। शिक्षक, बच्चे और अजनबी के साथ हमारा व्यवहार अलग होगा ही। श्लोक आदर की गुणवत्ता की बात करता है, भूमिकाओं और कर्तव्यों को नकारने की नहीं।
- "तो मुझे सब पर भरोसा कर लेना चाहिए।" समान आदर का मतलब अंधा विश्वास नहीं है। आप किसी व्यक्ति का सम्मान करते हुए भी हानिकारक व्यवहार से दूरी रख सकते हैं।
- "यह तो सिर्फ़ पुराने समाज की बात है।" उदाहरण कृष्ण के समय के हैं, पर बात आज भी उतनी ही सच है। सूची की जगह अपने आसपास के लोगों को रख लीजिए, संदेश वही रहेगा।
रोज़ की ज़िंदगी में कैसे अपनाएँ
- सेवा करने वालों के साथ: "धन्यवाद" कहिए और उनकी आँखों में देखकर कहिए। ड्राइवर, सफ़ाईकर्मी, वेटर और गार्ड के भी परिवार होते हैं और उनके भी बुरे दिन आते हैं।
- असहमत लोगों के साथ: जवाब देने से पहले सुनिए। असहमति रह सकती है, पर अपमान करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
- पशु-पक्षियों के साथ: प्यासे कुत्ते या चिड़िया को थोड़ा पानी देना सब प्राणियों को स्नेह से देखने का छोटा अभ्यास है।
- खुद के साथ: अगर आपको लगे कि आप सिर्फ़ काम के लोगों का सम्मान करते हैं, तो रुककर पूछिए, "अगर यह कोई बड़ा आदमी होता, तो क्या मैं ऐसे ही बोलता?"
एक आसान अभ्यास: दिन के अंत में किसी एक व्यक्ति को याद कीजिए जिसके साथ आप लापरवाह रहे। अगले दिन उसे वैसी ही नरमी दीजिए जैसी किसी मेहमान को देते हैं। ऐसे छोटे कदम धीरे-धीरे हमारी दृष्टि बदलते हैं।
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संक्षेप में
गीता 5.18 कहती है कि ज्ञानी विद्वान, गाय, हाथी, कुत्ते और समाज के सबसे निचले माने गए व्यक्ति को भी समान भीतरी आदर से देखता है। भूमिकाएँ और स्वभाव अलग हो सकते हैं, पर गरिमा अलग नहीं होती। इंसान को देखिए, सिर्फ़ उसके लेबल को नहीं।