गीता अध्याय 6 श्लोक 35: चंचल मन को कैसे वश में करें (सरल अर्थ)

गीता अध्याय 6 श्लोक 35 "असंशयं महाबाहो" का शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ और जीवन में उपयोग। जानिए श्रीकृष्ण चंचल मन को अभ्यास और वैराग्य से कैसे स्थिर करने को कहते हैं।

· 4 min read

पढ़ने बैठते हैं तो मन कहीं और चला जाता है। पूजा में बैठते हैं तो दस बातें याद आने लगती हैं। अगर आपके साथ भी ऐसा होता है, तो आप अकेले नहीं हैं। अर्जुन जैसे महान योद्धा ने भी श्रीकृष्ण से यही शिकायत की थी।

नीचे वह श्लोक है जिसमें कृष्ण इसका उत्तर देते हैं, साथ में सरल अर्थ और रोज़ के जीवन में उपयोग।

श्लोक (गीता 6.35)

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ६.३५ ॥

श्रीभगवान बोले: हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल है और उसे वश में करना कठिन है। परंतु हे कुन्तीपुत्र! अभ्यास और वैराग्य से उसे वश में किया जा सकता है।

शब्दार्थ

  • असंशयम्: निःसंदेह, बिना किसी शंका के
  • महाबाहो: हे महाबाहु (अर्जुन)
  • मनः: मन
  • दुर्निग्रहम्: जिसे वश में करना कठिन है
  • चलम्: चंचल, हमेशा हिलने वाला
  • अभ्यासेन: अभ्यास से
  • तु: परंतु
  • कौन्तेय: हे कुन्तीपुत्र (अर्जुन)
  • वैराग्येण: वैराग्य से, आसक्ति छोड़ने से
  • च: और
  • गृह्यते: वश में किया जाता है, पकड़ा जाता है

यह श्लोक कहाँ से आता है?

अध्याय 6 में कृष्ण ध्यान की विधि समझा रहे हैं: स्थिर होकर बैठो, इन्द्रियों को शांत रखो, मन को एक जगह लगाओ। तब अर्जुन सीधे कहता है कि यह बहुत कठिन लगता है, क्योंकि मन चंचल, बलवान और ज़िद्दी है, और उसे रोकना हवा को रोकने जैसा लगता है। श्लोक 35 कृष्ण का उत्तर है। ध्यान दीजिए, वे अर्जुन को डाँटते नहीं। पहले वे मान लेते हैं कि हाँ, मन को वश में करना कठिन है। फिर उपाय बताते हैं।

श्लोक का असली संदेश

  • पहले समस्या मानी गई है। कृष्ण यह दिखावा नहीं करते कि शांत मन आसानी से मिल जाता है। जब हम जान लेते हैं कि चंचलता सामान्य है, तो शर्म कम हो जाती है।
  • अभ्यास का मतलब है एक चुने हुए केंद्र पर बार-बार लौटना, जैसे प्रार्थना, साँस, कोई श्लोक या कोई काम, नियम से और धैर्य से।
  • वैराग्य का मतलब है उन चीज़ों की पकड़ ढीली करना जिनके पीछे मन भागता रहता है। यह संसार से नफ़रत नहीं है। यह हर इच्छा और हर नतीजे को पकड़कर बैठे रहने की ज़रूरत छोड़ना है।
  • दोनों चाहिए। वैराग्य के बिना अभ्यास तनाव भरा संघर्ष बन सकता है। अभ्यास के बिना वैराग्य सिर्फ़ एक विचार रह जाता है।

तीन आम गलतफहमियाँ

  1. "अच्छे साधक के मन में कोई विचार नहीं आता।" श्लोक यह वादा नहीं करता कि मन कभी नहीं भटकेगा। वह कहता है कि मन को पकड़ा जा सकता है, यानी भटकते देखना और धीरे से वापस ले आना सीखा जा सकता है।
  2. "वैराग्य का मतलब घर, काम और खुशियाँ छोड़ देना है।" यहाँ वैराग्य भीतर की पकड़ के बारे में है, जीवन छोड़ने के बारे में नहीं। आप अपनों से प्रेम कर सकते हैं और काम अच्छे से कर सकते हैं, बस हर नतीजे के गुलाम न बनें।
  3. "आज नहीं हुआ तो यह मेरे लिए नहीं है।" कृष्ण "अभ्यास" शब्द इसीलिए चुनते हैं कि यह लंबा रास्ता है। जो मन सौ बार भटककर एक सौ एक बार लौट आता है, वह अच्छा प्रशिक्षण पा रहा है।

रोज़ की ज़िंदगी में कैसे अपनाएँ

  • छोटी शुरुआत: रोज़ पाँच मिनट, एक ही समय, एक ही जगह। शांत बैठिए, कोई सरल प्रार्थना दोहराइए या साँस को देखिए। समय से ज़्यादा नियमितता मायने रखती है।
  • जब मन भटके: खुद को डाँटिए मत। देखिए, मुस्कुराइए और लौट आइए। यही लौटना असली अभ्यास है।
  • पढ़ाई और काम में: एक घंटे के लिए फ़ोन दूसरे कमरे में रखिए और सिर्फ़ एक काम कीजिए। यह आज के समय का अभ्यास है।
  • वैराग्य के लिए: किसी बड़े नतीजे से पहले खुद से कहिए, "मैं पूरी मेहनत करूँगा, और नतीजा पूरी तरह मेरे हाथ में नहीं है।" गीता के दूसरे अध्यायों में कृष्ण यही भाव सिखाते हैं।
  • प्रगति पर धैर्य रखिए: एक हफ्ते में बड़ा बदलाव न दिखे तो घबराइए मत। कुछ महीनों बाद पीछे मुड़कर देखिए।

पूरी गीता सरल हिंदी में पढ़ें

यह श्लोक कृष्ण और अर्जुन की एक लंबी, स्नेह भरी बातचीत का हिस्सा है। अगर आप पूरी भगवद्गीता को हर संस्कृत श्लोक और सरल हिंदी अर्थ के साथ पढ़ना चाहते हैं, तो सात्विक सेतु हिंदी बंडल में यह मिलेगी: 14 ग्रंथ और 2 बोनस, सरल हिंदी में, जिसमें गीता के सभी 700 श्लोक हैं। पहले मुफ़्त सैंपल पढ़कर देख सकते हैं: गीता अध्याय 12 मुफ़्त सैंपल (PDF)।

संक्षेप में

कृष्ण मानते हैं कि मन चंचल है और उसे वश में करना कठिन है, फिर गीता 6.35 में रास्ता बताते हैं: लगातार अभ्यास और कोमल वैराग्य। बार-बार लौटिए, पकड़ ढीली कीजिए और अपने साथ धैर्य रखिए।

Share on WhatsApp

Read more

20 Oct 2026

महाभारत में कर्ण की कहानी: चुनाव, मित्रता और चरित्र की सीख

महाभारत के कर्ण की कहानी सरल हिंदी में और उसके जीवन से चुनाव, मित्रता, निष्ठा और चरित्र की सीख। परंपरागत तथ्य, ईमानदार शिक्षाएँ और आम गलतफहमियाँ।

Read more

All articles