गीता अध्याय 2 श्लोक 47: कर्म करो, फल की चिंता मत करो (सरल अर्थ)
गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक "कर्मण्येवाधिकारस्ते" का शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ, इसके पीछे की कथा और आज के जीवन में इसका उपयोग, आसान भाषा में।
श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक शायद सबसे ज़्यादा बोला और सुना जाने वाला श्लोक है। परीक्षा हो, नौकरी हो या कोई बड़ा फैसला, यह एक पंक्ति मन को शांत कर देती है। आइए इसे शब्द-शब्द समझते हैं।
मूल श्लोक
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
सरल अर्थ: तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में कभी नहीं। इसलिए तू फल को ही अपने कर्म का कारण मत बना, और कर्म न करने में भी तेरी आसक्ति न हो।
शब्दार्थ
- कर्मणि एव – केवल कर्म में
- अधिकारः ते – तेरा अधिकार है
- मा फलेषु कदाचन – फल में कभी नहीं
- मा कर्मफलहेतुः भूः – कर्म के फल का कारण मत बन
- मा ते सङ्गः अस्तु अकर्मणि – कर्म न करने में तेरी आसक्ति न हो
यह बात कब कही गई?
कुरुक्षेत्र के युद्ध से ठीक पहले अर्जुन अपने ही परिवार वालों को सामने देखकर दुविधा में पड़ गए थे। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया कि मनुष्य का काम अपना कर्तव्य पूरी ईमानदारी से निभाना है। नतीजा क्या होगा, वह बहुत सी बातों पर निर्भर करता है जो हमारे हाथ में नहीं हैं।
श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म छोड़ने को नहीं कहते, बल्कि फल की चिंता छोड़कर पूरे मन से कर्म करने को कहते हैं।
आज के जीवन में इसका मतलब
- पढ़ाई में: रिज़ल्ट की चिंता में समय गँवाने के बजाय रोज़ की पढ़ाई पर ध्यान दें।
- काम में: प्रमोशन से ज़्यादा अपने काम की क्वालिटी पर ध्यान दें।
- रिश्तों में: बदले में क्या मिलेगा, यह सोचे बिना अपना फ़र्ज़ निभाएँ।
एक आम गलतफ़हमी
कई लोग सोचते हैं कि इस श्लोक का मतलब है "फल की उम्मीद ही मत करो"। असल में श्लोक कहता है कि फल को कर्म का कारण मत बनाओ। लक्ष्य रखना गलत नहीं है, लेकिन नतीजे के डर से काम करना छोड़ देना या आधे मन से करना गलत है।
सार
कर्म पर हमारा पूरा अधिकार है, फल पर नहीं। जो हमारे हाथ में है उसे पूरी ईमानदारी से करें, बाकी भगवान पर छोड़ दें। यही गीता का कर्मयोग है।