योगसूत्र 2.46: स्थिरसुखमासनम्, स्थिर और सुखद आसन का अर्थ (सरल हिंदी)
पतंजलि योगसूत्र 2.46 "स्थिरसुखमासनम्" का शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ और मतलब। जानिए स्थिर और सुखद आसन का सही अर्थ और बैठने, पढ़ने व ध्यान में इसका उपयोग।
"योग" सुनते ही अधिकतर लोगों को कठिन मुद्राएँ याद आती हैं। पर योग के सबसे प्राचीन ग्रंथ पतंजलि के योगसूत्र में आसन की परिभाषा सिर्फ़ दो शब्दों में दी गई है। यह योग की सबसे छोटी और सबसे व्यावहारिक पंक्तियों में से एक है।
आइए सूत्र, उसका अर्थ और आज के जीवन में उसका उपयोग देखें।
सूत्र (योगसूत्र 2.46)
स्थिरसुखमासनम् ॥ २.४६ ॥
आसन वह है जो स्थिर और सुखपूर्वक हो।
शब्दार्थ
- स्थिर: दृढ़, अडिग, टिका हुआ
- सुखम्: सुखद, आरामदायक
- आसनम्: बैठने की स्थिति, आसन
यह सूत्र कहाँ से आता है?
योगसूत्र चार पादों में बँटा है। दूसरा पाद, साधनपाद, अभ्यास के बारे में है। इसमें योग के आठ अंग बताए गए हैं: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। आसन तीसरा अंग है। यम और नियम के सूत्रों के बाद पतंजलि आसन पर यह छोटा सा सूत्र देते हैं। इस ग्रंथ में आसन का उद्देश्य शरीर को ध्यान के लिए स्थिर होकर बैठने योग्य बनाना है।
सूत्र का असली संदेश
- स्थिर। शरीर काँप नहीं रहा, झुक नहीं रहा, बार-बार हिल नहीं रहा। आसन को बिना संघर्ष के बनाए रखा जा सकता है।
- सुखद। कोई खिंचाव या दर्द नहीं। बैठना हल्का और सुखद लगता है।
- दोनों साथ। आराम के बिना स्थिरता अकड़न बन जाती है। स्थिरता के बिना आराम आलस्य बन जाता है। योग इन दोनों के संतुलन को माँगता है।
- बात आसन की है, दिखावे की नहीं। यहाँ कहीं नहीं लिखा कि और झुको या सुंदर दिखो। कसौटी यह है कि आसन के भीतर आप कैसा अनुभव करते हैं।
परंपरा के अनुसार अगले सूत्र बताते हैं कि यह स्थिति प्रयत्न को ढीला करने और अनंत पर ध्यान टिकाने से मिलती है, और तब सर्दी-गर्मी जैसे द्वंद्व बाधा नहीं डालते।
तीन आम गलतफहमियाँ
- "आसन मतलब कठिन खिंचाव।" सूत्र केवल दो कसौटियाँ देता है, स्थिर और सुखद। आज के कई योगासन बाद की परंपराओं से आए हैं, पर यह सूत्र स्वयं जटिल मुद्राएँ नहीं माँगता।
- "सुखद का मतलब लेटकर आलस करना।" नहीं। "स्थिर" शब्द उतना ही ज़रूरी है। आसन स्थिर और सजग होना चाहिए।
- "दर्द हो रहा है तो असर हो रहा है।" यह सूत्र उलटी दिशा में इशारा करता है। दर्द और खिंचाव सुधार करने का संकेत हैं। चोट या बीमारी हो तो नया आसन करने से पहले योग्य शिक्षक या डॉक्टर से पूछिए।
रोज़ की ज़िंदगी में कैसे अपनाएँ
- पढ़ने बैठते समय: ऐसी कुर्सी या आसन चुनिए जिसमें पीठ बिना ज़ोर के सीधी रहे और पैर टिके हों। जो असुविधा दे रहा हो, उसे बदल लीजिए।
- ध्यान या पूजा में: गद्दी या कुर्सी, जिस पर बिना दर्द के स्थिर बैठ सकें। कुर्सी भी बिल्कुल ठीक है।
- डेस्क पर काम में: हर घंटे जाँचिए। कंधे तने हैं? गर्दन झुकी है? छोटा सा सुधार कीजिए।
- जीवन में आम तौर पर: किसी भी आदत के लिए यही दो प्रश्न पूछिए: "क्या यह स्थिर है?" और "क्या यह सुखद है?" अच्छी दिनचर्या दोनों होती है।
एक सरल अभ्यास: दो मिनट रीढ़ सीधी और कंधे ढीले रखकर बैठिए। साँस को देखिए। हिलना हो तो धीरे से हिलिए और फिर टिक जाइए। यही सूत्र का सार है।
पूरी गीता सरल हिंदी में पढ़ें
योग गीता का भी बड़ा विषय है, जिसके अध्याय 6 में उचित आसन और स्थिर मन की बात आती है। पूरी गीता को हर संस्कृत श्लोक और सरल हिंदी अर्थ के साथ पढ़ना चाहें तो सात्विक सेतु हिंदी बंडल में 14 ग्रंथ और 2 बोनस हैं, सरल हिंदी में, जिसमें गीता के सभी 700 श्लोक हैं। पहले मुफ़्त सैंपल देख सकते हैं: गीता अध्याय 12 मुफ़्त सैंपल (PDF)।
संक्षेप में
योगसूत्र 2.46 दो शब्दों में कहता है कि अच्छा आसन स्थिर और सुखद होता है, न बहुत कसा हुआ, न बहुत ढीला। ऐसा आसन खोजिए जिसमें आप आराम से टिक सकें, तो मन को भी टिकना आसान होता है।